Neurological Diseases / न्यूरोलॉजिकल बीमारियां

न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भारत में एक महामारी का रूप धारण कर चुकी हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब 3 करोड़ लोग किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित हैं और इस संख्या में हर साल तेजी से वृद्धि हो रही है। 

न्यूरोलॉजिकल बीमारियां वे बीमारियां हैं जो हमारे शरीर के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती हैं यानि मस्तिष्क, स्पाइनल कॉर्ड और अन्य नसों से संबंधित बीमारियां न्यूरोलॉजिकल बीमारियां कहलाती हैं। नर्वस सिस्टम की संरचना और क्रियाशीलता में कोई भी परेशानी न्यूरोलॉजिकल बीमारी का कारण बन सकती है। 

तेज रफ्तार जिंदगी, शारीरिक व मानसिक तनाव और चिंता, बढ़ता प्रदूषण, हानिकारक केमिकल्स का फूड – प्रोडक्ट्स में उपयोग, कीटनाशकों का खेती में निरंतर उपयोग, जीवन शैली व मेटाबोलिज्म से जुड़ी डायबिटीज व हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां,बढ़ती उम्र, सामाजिक ढांचे में बदलाव से बढ़ता अकेलापन, असंतुलित न्यूट्रिशन लेने से अधिकांश लोगों में बढ़ता मोटापा व महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी, अन्य रोगों के उपचार के लिए ली जा रही दवाओं के दुष्प्रभाव, आदि अनगिनत कारणों से हमारे तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) पर गंभीर दबाव पड़ रहा है। 

फलस्वरूप, नर्वस सिस्टम की समस्याएं असंख्य लोगों को अपना शिकार बना रही हैं। उदाहरण के लिए, भारत के विभिन्न भागों में 24 प्रतिशत तक लोगों में होने वाली पेरिफेरल न्यूरोपैथी जैसी समस्या में पेरिफेरल नर्स (ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड को शरीर के बाकी सभी अंगों व त्वचा के साथ जोड़ने वाली नर्स) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इससे शरीर के अंग, विशेषतः, पैर सुन्न होने लगते हैं या फिर उनमें दर्द, झुनझुनी और कमज़ोरी हो जाती है। 

वैज्ञानिकों ने पाया है कि अधिक शराब पीने वालों में, शहरी स्लम्स में रहने वालों में, हानिकारक औद्योगिक केमिकल्स और आर्सेनिक, मरक्यूरी, लेड जैसे प्रदूषक तत्वों और कीटनाशक दवाइयों के सम्पर्क में आने वाले लोगों में नर्स की क्षति हो सकती है। किडनी के रोगों, उच्च-रक्तचाप या पेट के संक्रमण से पीड़ित लोगों में भी पेरिफरल नर्स की क्षति होने की अधिक संभावना होती है। डायबिटिक या प्री डायबिटिक लोगों में तो इस समस्या के होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

वास्तव में भारत के लगभग 16 करोड़ डायबिटिक और प्री-डायबिटिक लोगों में से अनुमानत: 50 प्रतिशत लोग या तो पेरिफरल नर्व्स की क्षति से ग्रसित हैं या भविष्य में हो जायेगे। भारतीय आहार में नर्व्स के स्वास्थ्य के लिए विशेषतः आवश्यक पोषक तत्वों की व्यापक कमी भी इस समस्या को जन्म दे सकती है। हाथ-पांव यानि मसल्स ढीले पढ़ना, बढ़ता चिड़चिड़ापन, दर्द के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता, याददाश्त व मानसिक कार्यक्षमता का घटना, सिरदर्द रहना, आदि नर्वस सिस्टम की समस्याओं के कुछ अन्य लक्षण है। मस्तिष्क व शरीर के बाकी अंगों के सामंजस्य में कमी आना भी न्यूरोलॉजिकल बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। 

गंभीर स्थितियों में यह लक्षण मिर्गी, शरीर में तीव्र दर्द और मानसिक अक्षमता के रूप में प्रकट हो सकते हैं। न्यूरोलॉजिकल व मानसिक बीमारियों से ग्रसित लोगों में एक या एक से ज्यादा लक्षण दिखाई दे सकते हैं। आम लोगों में बढ़ती इन व्यापक न्यूरोलॉजिकल व मानसिक समस्याओं से बचाव के लिए कई विटामिन्स, मिनरल्स व एंटीऑक्सीडेंट्स उपयोगी सिद्ध हुए हैं। वैज्ञानिक रिसर्चों के अनुसार बी कॉम्पलेक्स समूह के विटामिनों व विटामिन D का सेवन डिप्रेशन को दूर करने और मूड में आने वाले बदलावों को कम करने में लाभकारी है।

वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि आयरन का सप्लीमेंटेशन एकाग्रता और ऊर्जा की कमी और मूड के बदलाव, आदि लक्षणों को ठीक करने में उपयोगी है। सेलेनियम भी डिप्रेशन, चिंता, भय, थकान, आदि के लक्षणों में कमी लाता है। अंतरराष्ट्रीय रिसर्च के अनुसार विटामिन्स (जैसे विटामिन A, B, B., B… C, D और E) तथा मिनरल्स (कैल्शियम, आयरन, मन्नीशियम, जिंक, सेलिनियम, फॉस्फोरस, आदि) से युक्त न्यूट्रीशनल सप्लीमेंट्स लेने से पेरिफेरल नर्स की क्षति थामने में मदद मिलती है और चिंता, तनाव, डिप्रेशन, थकान, आक्रामक व्यवहार, आदि लक्षण दूर होते हैं। कई गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों जैसे अल्जाइमर्स, पार्किंसन, मिर्गी व सेरेब्रल पाल्सी के खतरे को कम करने में भी विभिन्न विटामिन्स, मिनरल्स और कार्बोहाइड्रेट्स व प्रोटीन की उपयोगिता कई शोधों द्वारा सिद्ध है। 

अल्जाइमर्स या सामान्य भाषा में सठिया जाना धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है जो ब्रेन के कार्य को प्रभावित करती है। यह बीमारी याददाश्त, बोलने की क्षमता, मूड, निर्णय लेने की क्षमता, सामाजिक व्यवहार, आदि को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और जीवन की गुणवत्ता पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालती है। 

वैज्ञानिकों के अनुसार विटामिन C, विटामिन E जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स, अमीनो एसिड्स जैसे L ग्लूटामिन, सिस्टीन, ब्लूटाथियॉन, आदि का सेवन अल्जाइमर्स के खतरे को कम करने के लिए बहुत लाभदायक है। B कॉम्पलक्स समूह के विटामिन्स विशेषत: फोलिक एसिड, विटामिन B12 व B6 की कमी अल्जाइमर्स के खतरे को बढ़ा देती है। ओमेगा-3 के सेवन से अल्जाइमर्स में होने वाली ब्रेन की सूजन और संरचनात्मक बदलावों को ठीक करने में सहायता मिलती है।

पार्किंसन यह न्यूरोलॉजिकल बीमारी न्यूरॉन्स को क्षति पहुंचने के कारण होती है व इसमें रोगी का अपनी मसल्स और गतिशीलता पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। हाथ-पैर में कंपकंपी, धीमी गतिविधियां, मांसपेशियों का कठोर होना, असंतुलन, लिखावट में परिवर्तन, बिगड़ी हुई चाल, आदि पार्किंसन रोग के लक्षण हो सकते हैं। बढ़ती आ, अनुवांशिकता, विषाक्त पदार्थों से संपर्क आदि पार्किंसन के खतरे को बढ़ा देते हैं। 

वैज्ञानिकों ने यह स्थापित किया है कि विटामिन B, विटामिन E, बीटा कैरोटीन, विटामिन C जैसे विटामिन्स और आयरन, जिंक, मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स पार्किंसन होने के खतरे को कम कर देते हैं। प्रोटीन का सेवन पार्किंसन के मरीजों में सामंजस्य के लिये जरूरी मोटर नर्स की कार्यशीलता को बढ़ा सकता है।

इपिलेप्सी (मिर्गी) – मिर्गी सेंट्रल नर्वस सिस्टम का रोग है जिसमें रोगी को दौरे या झटके आते हैं। हाथ-पैर पटकना, मुंह से झाग आना, बेहोशी, आदि मिर्गी के लक्षण हो सकते हैं।

मिर्गी में विटामिन C. जिंक, कॉपर और सेलेनियम का सेवन एंटीऑक्सीडेंट सिस्टम व न्यूरॉन्स की क्रियाशीलता बनाये रखता है और दौरों के इलाज में मददगार है। विटामिन D और कैल्शियम की आपूर्ति इन मरीजों में हड़ियों में मिनरल्स का जमाव बनाने में सहायक है।

सेरेब्रल पाल्सीयह शरीर के विभिन्न अंगों और मांसपेशियों की गतिविधियों या उनकी बनावट का विकार है। मांसपेशियों का अकड़ना, ढीला पड़ना, उनकी अधूरी या गलत बनावट, सही ढंग से न चल पाना, आदि इसके लक्षण है।

सेरेब्रल पाल्सी से ग्रसित लोगों में भी विटामिन्स व मिनरल्स का सेवन लाभदायक सिद्ध हुआ है। चूंकि इस रोग से ग्रसित बच्चों की हड्डियां कमजोर हो सकती हैं. इसलिए कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन D का सेवन हड्डियों को मजबूती प्रदान कर सकता है। पोषक तत्वों व खासकर प्रोटीन से भरपूर न्यूट्रीशन सेरेब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चों में ब्रेन की सुरक्षा व इनके न्यूरोलॉजिकल विकास में सहायक होता है।

न्यूरोलोजिकल बीमारियों से बचाव में ओमेगा-3 का महत्व

न्यूट्रीचार्ज वेज ओमेगा के फायदे

आमतौर पर होने वाली व गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों, दोनों से बचाव व रोकथाम में विशेषत: ओमेगा-3 का सेवन सहायक सिद्ध हुआ है। ओमेगा-3 विभिन्न न्यूरोट्रांसमीटर्स जैसे सेरोटोनिन, नॉरएड्रेनलिन और डोपामाइन के उत्पादन में उपयोगी है। याददाश्त, भावनाओं, नींद, दर्द, आदि संवेदनाओं पर ओमेगा-3 के सेवन का सीधा असर पड़ता है। वे बीमारियां जिनमें न्यूरॉन्स की क्षति होती है, उनमें ओमेगा-3 का सेवन फायदेमंद होता है। कि ओमेगा-3 पर्याप्त मात्रा में शरीर द्वारा निर्मित नहीं किए जा सकते इसलिए इन्हें बाहरी स्त्रोत (जैसे ओमेगा-3 सप्लीमेंट्स) के द्वारा लेना रेकमेंड किया गया है।

न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से बचाव में डीएचए का महत्व

DHA

वैज्ञानिकों के अनुसार डीएचए का सेवन न सिर्फ ब्रेन के निर्माण व विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है बल्कि डीएचए कई प्रकार के मानसिक रोगों व न्यूरोलॉजिकल विकारों में व विशेषतः न्यूरोडीजेनरेटिव (नस के क्षय) समस्याओं में लाभ प्रदान कर सकता है। हाल ही में प्रकाशित कुछ शोधों के अनुसार बढ़ती उम्र के साथ होने वाली मानसिक कार्यक्षमता की हानि से बचाव के साथ-साथ किसी आघात से होने वाली नर्स की क्षति से बचाव में डीएचए लाभकारी हो सकता है। डीएचए के शुद्ध रूप (एलीमेंटल फार्म) के सेवन के लिए डीएचए युक्त सप्लीमेंट्स लेने चाहिए।

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