Detoxification / डिटॉक्सीफिकेशन

हमारे शरीर में विषैले पदार्थों को बाहर निकालने (Detoxification) की एक प्राकृतिक प्रणाली है। हमारे शरीर के विभिन्न अंग आंतरिक सिस्टम की सफाई के लिए मिलकर काम करते हैं। लिवर और किडनी (गुर्दे) वे मुख्य अंग हैं जो क्रनाश: एक केमिकल फैक्ट्री व पिल्टर की तरह कार्य करते हैं और जिनकी हमारे शरीर व रक्त के शुद्धीकरण में मुख्य भूमिका होती है। लेकिन शरीर के अत्यधिक और लंबे समय तक विषैला रहने पर इन अंगों के सामान्य कार्य बाधित होते हैं।

डिटॉक्सीफिकेशन में लिवर का महत्व

लिवर हमारे शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है और 500 से भी अधिक कार्य करता है। लिवर हमारे शरीर का डिटॉक्सीफाइंग केन्द्र भी है और शरीर में उत्पन्न होने वाले टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकाल कर उनके हानिकारक प्रभावों से हमें बचाता है। Detoxification प्रक्रिया में लिवर सभी विषैले व अपशिष्ट तत्वों को ऐसे घुलनशील या निष्क्रिय पदार्थों में परिवर्तित करता है जिन्हें गुर्दो द्वारा बाहर निकाला जा सकता है।

अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं के पूर्ण होने पर लिवर शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों, जिनका अवशोषण जरूरी है, और हानिकारक या अनावश्यक पदार्थ, जिनको किडनी के द्वारा खत से बाहर निकालना जरूरी है, को अलग-अलग करता है। लेकिन जब लिवर में विषैले पदार्थों का अत्यधिक दबाव होता है तब वह विभिन्न पोषक तत्वों व हमारे द्वारा लिए गए अन्य रसायनों के परिवर्तन व उनके उचित उपयोग का कार्य प्रभावी रूप से नहीं कर पाता है। इसलिए विषैले पदार्थों को गुर्दो द्वारा बाहर निकालने की प्रक्रिया बाधित होती है। 

शराब का लिवर पर दुष्प्रभाव

Detoxification

कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्चो ने यह सिद्ध किया है कि शराब के सेवन का लिवर पर बहुत बुरा असर पड़ता है और यह लिवर को धीरे धीर नष्ट कर देता है। लिवर में शराब के मेटाबॉलिज्म के दौरान कुछ अत्यंत हानिकारक तत्व उत्पन्न होते हैं जो लिवर की कोशिकाओं को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं। शराब के सेवन से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा घटती है जिससे फ्री रेडिकल्स द्वारा होने वाली क्षति बढ़ जाती है और लिवर पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ता  है।

शराब का सेवन लिवर की कार्यशीलता व डिटॉक्सीफाइंग क्षमता को घटा देता है और धीर-धीर लिवर में विषैले तत्व जमा होने लगते हैं जो बीमारियों का कारण बन जाते हैं। चूंकि लिवर में पुर्न निर्माण की क्षमता होती है इसलिए लिवर की क्षति के लक्षण शुरू में पता नहीं चलते पर शराब पीते रहने से वक्त के साथ-साथ लिवर की कार्यक्षमता घटती रहती है और लिवर में फैट का जमाव बढ़ जाता है।

यही फैटी लिवर शराब का सेवन करने वालों में पायी जाने वाली प्रमुख बीमारी है। शराब पीते रहने वाले 50% लोगों को एल्कोहॉलिक हेपेटाइटिस यानि लिवर में सूजन हो जाती है, कोशिकाओं को क्षति पहुंचती है और बुखार, पीलिया व पेट दर्द जैसे लक्षण पैदा होने लगते हैं। अगर लिवर की इस क्षति की समय रहते रोकथाम न की जाए तो लिवर सिरोसिस नामक गंभीर बीमारी हो सकती है जिसमें लिवर की संरचना ही बदलने लगती है। इससे ब्रेन व किडनियों की कार्यक्षमता भी घट जाती है।

अंतत: स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो जाती हैं और प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। शराब के अलावा बैक्टीरिया, प्रोसेस्ड खाटा पदार्थों में प्रयुक्त रसायन, तंबाकू, प्रदूषित जल, दवाओं से उत्पन्न टॉक्सिन्स, आदि लिवर को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। कमज़ोर पाचन से भी शरीर में विषैले पदार्थों का निर्माण होता है। खाने-पीने की बुरी आदतें व खराब जीवन शैली के कारण होने वाला करज़ भी आंतों में विषैले पदार्थों के जमाव के कारण हैं। अत: लिवर के डिटॉक्सीफाइंग गुणों को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लिवर स्वस्थ और कार्यशील बना रहे।  

डिटॉक्सीफिकेशन शरीर से अशुद्धियों, अपशिष्ट तथा विषैले पदार्थों को बाहर निकालने व रक्त के शुद्धिकरण की एक प्रक्रिया है जो रोगों से बचाव और पूर्णत: स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। एक डिटॉवस कार्यक्रम, शरीर से विषैले पदार्थों को हटाने के लिए लिवर की सक्रियता बढ़ा कर, किडनियों द्वारा इनके निष्कासन को बढ़ाकर और रक्त के परिसंतरण में सुधार से शरीर की प्राकृतिक सफाई में मदद करता है। डिटॉक्सीविहान आहार और जीवन शैली में परिवर्तन द्वारा विषैले पदार्थों के सेवन को घटाता है और निष्कासन को बढ़ाता है। प्रोसेस्ड , तले हुए, डिब्बाबंद या परिष्कृत खाद्य पदार्थों, परिष्कृत शक्कर, सफेद आटा, कैफीन, शराब, तंबाकू, कीटनाशक युक्त फल सब्जियों, रसायनों और कई दवाओं का सेवन न करने से विषैले पदार्थों का संचय घटता है।

प्रकृति ने भी हमें कई लिवर रक्षक हर्ब्स (बायोग्रीन्स) दिए हैं जो लिवर में विषैले पदार्थों का जाना रोकते हैं, सूजन घटाते हैं, लिवर की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बवाते हैं और उसकी डिटॉक्सीफिकेशन क्षमता को बढ़ाते हैं। सेक्कहेरम ओफिसिनेरम, एम्ब्लिका ऑफिसिनैलिस, एजाडिरेक्टा इंडिका, कुरकुमा लोंगा, ऑसीमम सैंक्टम, आदि बायोगीन्स शरीर में विषैले पदार्थों को नष्ट करने में मदद करते हैं।

पाचक एंजाइमों का सेवन पाचन में मदद करता है और पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ाकर हमें स्वस्थ रखता है। स्वास्थ्यकारी प्रोबायोटिक्स (मित्र बैक्टीरिया) हानिकारक बैक्टीरिया के विकास को रोकते हैं और हमारे पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं। यह हमारी आंतों से विषैले तत्वों को हटाने में भी सहायक होते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि प्राकृतिक बायोग्रीन्स, पाचक एंजाइम्स व प्रोबायेटिक्स जैसे लिवर रक्षक तत्वों से समृद्ध सप्लीमेंट्स का सेवन लिवर को स्वस्थ, कार्यशील व सुरक्षित रखने में बहुत सहायक है। जिस तरह से व्यायाम और अच्छी खाने की आदतें शारीरिक रूप से फिट और स्वस्थ रहने के लिए महत्वपूर्ण हैं उसी तरह शरीर से सभी हानिकारक विषैले अपशिष्ट पदार्थों को हटाने के लिए व स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन हमारे शरीर को डिटॉक्स करना भी महत्वपूर्ण है।

आशा करता हूँ आपको यह आर्टिकल भी पसंद आया होगा, इसे शेयर जरुर करे.

Leave a Comment

Share via