गाय, बकरी या भैंस – किसका दूध सबसे अच्छा होता है?

स्वास्थ्य प्राप्त करने की दृष्टिकोण किसका दूध सबसे अच्छा होता है? अगर देखा जाए तो गाय का ताजा दूध ही सर्वोत्तम है। पर गाय ऐसी हो जो नित्य जंगल में चारा चरने जाती हो और उसे किसी प्रकार की बीमारी न हो। स्वस्थ और तरुण श्यामा गौ का दूध साक्षात अमृत रूप बतलाया जाता है। पर ऐसी गायों का दूध आमतौर से मिलना असंभव ही है। शहरों के ग्वाले तो गाय को बड़ी लापरवाही से पालते हैं और उसे बहुत घटिया किस्म का खाना देते हैं। बहुत-सी गायें बाजारों तथा गलियों में घूमती हुई सड़ी-गली या गंदी चीजें भी खाती फिरा करती हैं। ग्वाले उस दूध को भी शुद्ध नहीं बेचते, उसमें पानी, मखनिया दूध या बासी दूध आदि मिलाकर दूषित कर देते हैं। आज की बात तो छोड़ दीजिए, एक लेखक ने बाजारी दूध की दुर्दशा का जिक्र करते हुए लिखा था-

अगर हम यही सवाल शहरों के लिए करें की किसका दूध सबसे अच्छा होता है? तो “शहरों की बात तो जाने दीजिए। छोटे-छोटे गाँवों में भी दूध दुर्लभ होता जाता है और यदि यही दशा रही तो आश्चर्य नहीं कि वह दिन निकट आ जाए जब केवल रोगी मनुष्यों को ही दूध का स्वाद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ करे। आजकल बाजारों में जैसा दूध मिलता है, उसे दूध कहना उसका अपमान करना है। वह इतना निकृष्ट होता है कि उसके पीने से न पीना ही अच्छा है। इस छोर से उस छोर तक चले जाइए, बाजार में शायद ही किसी दुकान यर ऐसा दूध मिल सके, जिसको स्वाभाविक और यत्किचित विशुद्ध दूध कहा जा सके। कहीं मक्खन निकला हुआ निस्सार भाग रखा होगा तो कहीं दूध के नाम पर सफेद पानी बिकता हुआ पाया जाएगा। यही नहीं, दुकानदारों तथा ग्वालों के अज्ञान तथा लापरवाही के कारण सड़क की धूल-मिट्टी आदि भी उड़-उड़कर दूध में मिल जाती है, जिसमें रोगों के कीटाणु भी रहते हैं। अनेक बार परीक्षा करने पर दूध में राजयक्ष्मा, हैजा आदि के कीटाणु पाए गए हैं और ऐसा विकृत दूध पीने वाले मनुष्यों को भी वह रोग हो गए हैं। यदि दूध पीने वाले पशु को अथवा ग्वाले या दुकानदार को कोई छूत का रोग हो, तब भी उसके कौटाणुओं का दूध पर प्रभाव हो जाना बहुत संभव होता है। रोग के जीवाणुओं का दूध पर प्रभाव यड़ने का सदैव भय रहता है।”

भैंस और बकरी का दूध 

भैंस का दूध ही आजकल ज्यादा काम में लाया जाता है और बाजार में आमतौर पर जो गर्म दूध तथा दही बिकता है, वह सब भैंस का ही होता है। इसका कारण यही है कि भैंस का दूध अधिक गाढ़ा होता है और उसमें भी घी का अंश अधिक होता है । इसलिए सामान्य लोग गाय के दूध के मुकाबले में उसे अच्छा भी मानते हैं । यों कोई युवा और अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाला व्यक्ति भैंस का दूध काम में लाए तो उसमें कोई खास बुराई नहीं बतलाई जाती, पर बच्चे, बुड्ढे, निर्बल, रोगी, कमजोर पाचन शक्ति वाले, इन सभी के लिए गाय का दूध ही भैंस से अच्छा है। साधारण स्वास्थ्य और शारीरिक शक्ति वाले मनुष्यों के लिए भी भैंस का दूध ज्यों का त्यों काम में लाना ठीक नहीं बतलाया गया है। उनके लिए उसमें चौथाई भाग पानी मिलाकर काम में लाना पाचन क्रिया की दृष्टि से अधिक उपयोगी होता है। यों प्रकट में स्वस्थ अवस्था में भैंस का दूध कोई हानि करता नहीं जान पड़ता, पर साधारण मनुष्य उसे पूरी तरह पचा नहीं सकते, इसलिए उसका बहुत-सा अंश बेकार ही निकल जाता है। 

यदि बकरी का दूध मिल सके तो स्वास्थ्य-संवर्द्धन अथवा रुग्णावस्था में वह भी बड़ा उपयोगी सिद्ध होता है। अनेक लोगों के मतानुसार तो निर्बल पाचन-शक्ति वाले और क्षीण रोगियों के लिए बकरी का दूध ही विशेष उपकारी होता है। बकरी का दूध हल्का होने से भैंस और गाय के दूध की अपेक्षा शीघ्र पच जाता है। बकरी अन्य प्रकार के चारे की बजाय तरह-तरह के पेड़ों की पत्तियां ही अधिक खाती है, इसलिए उसका दूध विटामिन युक्त और दोष रहित होता है। यह सच है कि उसमें चिकनाई का अंश कम होता है और फीकापन भी रहता है पर इससे उसके गुणों में कोई अंतर नहीं पड़ता। वह दमा, क्षय, पेट की बीमारियों की दशा में शीघ्र लाभ पहुँचाता है। उसे गाय के दूध की तरह धारोष्ण पिया जा सकता है, देर का रखा हो तो थोड़ा गरम किया जा सकता है। 

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