बेमेल भोजन की हानियाँ | Disadvantages of Mismatched Meals

यद्यपि सभी प्रकार के अनाज, दालें, फल, तरकारियाँ मानवीय आहार के उपयुक्त मानी गई हैं, पर जब उनमें से कई चीजों को एक साथ खाना हो तो यह प्रश्न सम्मुख आता है कि किन-किन चीजों का मेल लाभदायक है और किनका हानि पहुंचाने वाला ? 

इस संबंध में हमारे देश में कुछ बातें कहावत के तौर पर मशहूर हैं, जैसे उड़द की दाल के साथ मूली न खाई जाए, दाल और तेल के पदार्थों के साथ दही का प्रयोग न करना आदि। पर इन बातों का महत्व समझने और पालन करने वाले थोड़े ही दिखाई पड़ते हैं। अधिकांश मनुष्य स्वाद और जायके के आधार पर ही सब प्रकार के भोजनों का प्रयोग किया करते हैं। 

आधुनिक विज्ञान क्या कहता है

आधुनिक विज्ञान ने इस संबंध में खोज करके कुछ सिद्धांत स्थिर किए हैं, जिनसे विपरीत भोजन की परिभाषा और उसकी हानियाँ समझ में आती हैं। उसके अनुसार हमारे भोजन में दो तत्व अधिक मात्रा में होते हैं–एक ‘कार्बोहाइड्रेट” और दूसरा “प्रोटीन ”। कार्बोहाइड्रेट से शरीर को गरमी तथा कार्य शक्ति मिलती है और प्रोटीन से शरीर की वृद्धि होती है। कार्बोहाइड्रेट गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार, मक्का जैसे अन्नों और आलू, शकरकंद, गुड़, चीनी आदि में पाया जाता है। प्रोटीन सब प्रकार की दालों, सेम, मटर, मेवों और आमिष पदार्थों में अधिक मिलता है। कार्बोहाइड्रेट के पचने का मुख्य साधन क्षार होते हैं, जो लार के रूप में हमारे भोजन में मुँह में चबाते समय स्वयमेव मिलते जाते हैं। प्रोटीन के पचाने का कार्य आमाशय की ग्रंथियों से निकलने वाले रस से होता है, जिसकी प्रकृति ‘ अम्ल’ या ‘तेजाबी ‘ होती है। 

वैज्ञानिकों का कथन है कि यह क्षार-तत्व और अम्ल-रस एक-दूसरे के विपरीत हैं। यदि हम कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन वाले पदार्थ एक साथ खाते हैं तो ये दोनों ही प्रकार के पाचन-क्रिया करने वाले रस एक साथ निकलते हैं और अम्ल-रस के प्रभाव से क्षार-तत्त्व बहुत कुछ नष्ट हो जाते हैं या निर्बल पड़ जाते हैं और कार्बोहाइड्रेट को पचाने का काम समय अनुसार नहीं हो सकता है। इससे पाचनक्रिया में गड़बड़ी पैदा होती है और उसके बनने और मल के अंश के पृथक होने में अस्वाभाविक रूप से देर लगती है। यही प्रवृत्ति कब्ज की उत्पादक होती है, जिससे आगे चलकर अनेक रोगों की जड़ जमती है। 

यद्यपि हमारे देश में सदा से दाल-रोटी साथ खाने की प्रथा चली आई है, जिनमें से एक प्रोटीन प्रधान और दूसरी कार्बोहाइड्रेट प्रधान है; पर विज्ञान की दृष्टि से इस भोजन को आदर्श नहीं माना जा सकता। ऐसे भोजन के पचने में अवश्य ही उचित से अधिक समय लगता है और दूषित तत्व अधिक उत्पन्न होते हैं। इसके बजाय यदि रोटी को किसी भी हरी तरकारी या दूध-दही आदि के साथ खाया जाए, तो पचने में अधिक आसानी होती है। दूध में कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन दोनों तत्व रहते हैं। अत: यदि उसे पृथक खाया जाए, तो वह शीघ्र पचकर रक्त-रस बना सकता है। नींबू को भी स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी माना गया है, पर उसे रोटी के साथ खाने से उनकी खटाई लार के प्रभाव को घटा देती है। 

भारतीय भोजन का रिवाज़

हमारे देश में रोटी, दाल, शाक, चावल, दही, नींबू आदि की चटनी सब चीजें एक साथ ही खाने का रिवाज है। यद्यपि सदा से आदत पड़ जाने के कारण हमको न तो उसमें कोई दोष जान पड़ता है और न किसी कुप्रभाव का अनुभव होता है, पर इसमें संदेह नहीं कि अनेक चीजों का मिलाकर खाना पाचन क्रिया में अवश्य कठिनाई उत्पन्न करता है और उसी के कारण हम पूर्ण स्वस्थ नहीं रह पाते। अंग्रेज, अमेरिकन आदि यद्यपि मांस-मछली आदि प्राणिज पदार्थों का प्रयोग अधिक करते हैं, जो पचने में कठिन होते हैं, को भी वे अपने भोजन में अधिक प्रकार के पदार्थों को एक बार में ग्रहण नहीं करते, जिससे उनका स्वास्थ्य अधिक ठीक रहता है। 

भोज्य पदार्थों के मेल के विषय में सभी प्रदेशों और समाजों के व्यक्तियों के लिए एक जैसा नियम बना सकना प्राय: असंभव है। विभिन्न स्थानों के निवासी अपनी भौगोलिक स्थिति, पैदावार, सामाजिक परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार से बनाए गए, इतनी अधिक तरह के भोज्य पदार्थों को काम में लाते हैं कि उन सबका वर्गीकरण और समन्वय कर सकना अत्यंत कठिन कार्य है। इसलिए व्यावहारिकता को दृष्टिगोचर रखते हुए हम इतना ही कह सकते हैं कि एक बार में जितने कम पदार्थों को मिलाकर खाया जाएगा उतना ही पाचन-क्रिया में सुविधा रहेगी और रक्त-रस शुद्ध बनेगा। वैसे अनेक प्रकार के पदार्थों के खाने में कोई दोष नहीं है, वरन शरीर की आवश्यकता की पूर्ति के लिए विभिन्न तत्वों से युक्त पदार्थ खाने भी चाहिए, पर उनको अलग-अलग समय पर खाया जाए, तो स्वास्थ्य के लिए अधिक उत्तम है। इसी सिद्धांत को दृष्टिगोचर रखकर हमारे यहाँ धार्मिक अनुष्ठान, व्रत आदि के अवसर पर केवल एक प्रकार का भोजन, वह भी संभव हो तो, बिना नमक या चीनी वाला, ग्रहण करने का नियम रखा गया है। इससे आमाशय की स्थिति ठीक रहती है और साधना में किसी प्रकार की शारीरिक असुविधा उत्पन्न होने की आशंका मिट जाती है। 

अपने दैनिक जीवन में भी यदि हम एक बार के भोजन मैं कम से कम पदार्थ ग्रहण करने का ध्यान रखें और विपरीत प्रकृति की वस्तुओं को यथाशक्ति एक साथ मिलाकर न खाएं तो यह स्वास्थ्य की निगाह से अवश्य अधिक उपयोगी सिद्ध होगा और उससे हम वर्तमान स्थिति की अपेक्षा अधिक आरोग्य रह सकेंगे। 

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