कोरोना- मेरा अनुभव और विशेषज्ञों की सलाह

कोरोना-मेरा अनुभव

मित्रों! इस कोरोना रूपी वैश्विक महामारी ने काफी कुछ अनुभव कराया है और करा भी रहा है। मैंने इसे गंभीरता से पहले भी लिया था और आज भी ले रहा हूँ। फिर भी मैं इस कोरोना रूपी वैश्विक महामारी का शिकार हुआ। कुछ चीजों के बारे में जानकारी तो थी लेकिन कुछ चीजों से अनभिज्ञ था। हम पढ़े लिखे होकर भी कुछ ऐसी चीजों को सहज समझ लेते हैं जो कि आगे भविष्य में एक बड़ा कारण बन सकता है। 

जो दिक्कतें मैंने देखी वो तो कुछ भी नहीं, मेरी परेशानियों से भी बढ़कर बहुत लोगों की बड़ी बड़ी समस्याएं है जो इसका डटकर सामना कर रहें हैं। 

इस बीमारी से लड़ने के लिए मनः स्थिति की सकारात्मक होना बहुत जरूरी है। सकारात्मकता का यह मतलब नहीं की हमें कुछ नहीं हो सकता। कोरोना पॉजिटिव नहीं हुए हैं तब आपका डरना जायज है लेकिन हो जाने के बाद डरने से काम नहीं चलेगा। यही वह समय है जब हमें सतर्कता और सकारत्मकता बरतना जरूरी है। अगर आप कोविड पॉजिटिव आ गए हैं तो अपना मनोबल कम न होने दें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मनोबल और सकारात्मकता हमारे शरीर के अंदर कुछ ऐसे हार्मोन्स पैदा करते हैं जो किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं। इसके विपरीत अगर आप अपना मनोबल और सकारत्मकता खो देते हैं तो बीमारियां और वायरस सक्रिय हो जाते हैं।

मनोबल के साथ साथ कुछ और बातें हैं जिनका की हम विधिवत पालन करेंगे तो समस्याएं कम होंगी।

  • जैसे ही आपको कुछ लक्षण महसूस होता है आप अपने आपको अलग (Isolate) कर लें। क्योंकि आप नहीं चाहेंगे कि आपके साथ साथ आपके परिवार को भी इस स्थिति से गुजरना पड़े।
  • अलग होने का मतलब ये है कि संभव हो तो आप एक कमरे में चले जाएं, और अपने कपड़े, बर्तन और अपने दिनचर्या की चीजें भी अलग कर लें।
  • निश्चित रूप से सफाई का विशेष ध्यान दें। अपने अपने कपड़े उपयोग में लाएं। संभव हो तो रोज के कपड़ों को डेटॉल का उपयोग कर धोएं। हाथों को नियमित साफ और sanetize करते रहें। सबसे गंदा स्थान टॉयलेट होता है। वहां आप एक बाल्टी पानी में एक ढक्कन फिनाइल डालकर उसी पानी को टॉयलेट और उसे आस पास डालें।
  • सबसे कॉमन होता है दरवाजों का हैंडल और मोबाइल जो हर किसी के हाथ में लगता रहता है। इसे भी नियमित सेनेटाइज करते रहें।
  • रसोई साफ सुथरा हो। घर मे भी फिनाइल डालकर पोछा लगाए।
  • जैसा कि मैं पॉजिटिव हूं। तो मैं एक रूम में बंद हूँ। मेरे कमरे से कोई सामान बाहर नहीं जाता। मैं खाने के समय मास्क लगाकर अपना बर्तन बाहर रख देता हूँ और फिर दरवाजा बंद कर देता हूँ। उसमें खाना डाल दिया जाता है। उसके बाद फिर मास्क लगाकर बर्तन दरवाजे के बाहर से अंदर खींच लेता हूं। और खाकर अपना बर्तन खुद धोता हूँ। अपने कपड़े भी, कमरे में झाड़ू पोछा भी खुद करता हूँ। आप लोगों को हँसी आ रही होगी। लेकिन मैं ये सब मेरे परिवार के लोगों की सुरक्षा के लिये ही कर रहा हूँ। ताकि जो अभी मेरी सेवा कर रहें हैं भगवान न करे उन्हें कुछ हो जाये। क्योंकि ये स्ट्रेन हवा से फैलता है।

अगर आप स्वस्थ हैं फिर भी अभी से ये काम करें-

  1. रोज़ संभव तो दो बार भाप अवश्य लें।
  2. हमेशा गर्म पानी ही पियें।
  3. कपूर, अजवाइन, लौंग तीनों को मिलाकर कपड़े की एक पोटली बनाकर सूंघते रहें।
  4. अपना गमछा या तौलिया अलग रखें।

नोट-

  1. अगर बुखार, खाँसी, हाथ पैर दर्द ये लक्षण नज़र आये तो खुद को परिवार से अलग कमरे में कर लें
  2. और 2 से 3 दिन तक स्वास्थ्य ऐसा ही रहे तो तुरंत covid test कराएं।
  3. छुपाने से बीमारी बढ़ेगी और परिणाम घातक हो सकते हैं।
  4. पॉजिटिव आने पर अपने आस पड़ोस को भी बता दें। ताकि आपके संपर्क में लोगों में भी अगर लक्षण नज़र आये तो वो भी टेस्ट करा सकें।
  • कोविड-19 के इन्फेक्शन का स्तर भी तीन तरह का होता है, पहला माइल्ड, दूसरा मॉडरेट और तीसरा सीवियर (गंभीर)एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया जी का कहना है कि बहुत से लोग पॉजिटिव होने के बाद घबराहट में बहुत सारे टेस्ट जैसे CT scan, D-Dimmer कराते हैं। सबसे पहले आपको समझने की जरूरत है कि आपका इन्फेक्शन किस लेवल का है। अगर आपको सांस लेने में तकलीफ आ रही है तो जरूर CT Scan कराएं। इससे आपके फेफड़े में इन्फेक्शन का लेवल पता चलता है। लेकिन अगर आपका इन्फेक्शन माइल्ड है तो आपको CT Scan कराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि एक CT Scan करीब 300 एक्सरे के बराबर होता है और बार-बार CT Scan कराने से कैंसर जैसी घातक बीमारी होने का भी खतरा रहता है। इसलिए अपनी स्थिति को समझे। और अगर समझ न आये तो डॉक्टर से परामर्श लें।
  • देखिये घबराने की जरूरत नहीं है। ये वायरस आया है तो कुछ कष्ट देकर चला ही जायेगा। बस आपको इस दौरान अपना ऑक्सीजन लेवल चेक करते रहना है। विशेषज्ञों के अनुसार क्या है ऑक्सीजन लेवल, कितना होता है हेल्दी ऑक्सीजन लेवल, कैसे चेक करें और बढ़ाएं ऑक्सीजन लेवल।

क्या है ऑक्सीजन लेवल:

ब्लड सेल्स में ऑक्सीजन की मात्रा को परसेंटेज के आधार पर मापा जाता है। शरीर में रेड ब्लड सेल्स के अनुपात के बेसिस पर कोई भी ऑक्सीमीटर शरीर में ऑक्सीजन सैचुरेशन को परसेंटेज में बताता है। उदाहरण के लिए बताएं तो अगर किसी व्यक्ति का ऑक्सीजन लेवल 96 है तो ब्लड सेल्स में सिर्फ 4 परसेंट ऑक्सीजन की कमी है।

कितना होता है हेल्दी ऑक्सीजन लेवल:

Pulse Oximeter

एक्सपर्ट्स के अनुसार एक हेल्दी व्यक्ति में ऑक्सीजन का नॉर्मल लेवल 95 से 100 के बीच हो सकता है। 95 से कम ऑक्सीजन इस बात की ओर इशारा करता है कि व्यक्ति के फेफड़ों में कोई समस्या उत्पन्न हो रही है। वहीं, अगर ऑक्सीजन लेवल 92 या 90 परसेंट हो जाए तो डॉक्टर से जल्दी संपर्क करें।

कैसे करें ऑक्सीजन लेवल चेक:

लोग ऑक्सीमीटर के जरिये अपना ऑक्सीजन लेवल जांच सकते हैं। इसके बीच में उंगली डालने पर अंदर की ओर एक रोशनी जलती है जो ब्लड सेल्स के रंग और उसकी हलचल को डिटेक्ट करता है।

किन बातों का रखें ध्यान:

हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऑक्सीमीटर को जो हाथ आपका ज्यादा एक्टिव हो, उसकी बीच वाली उंगली में लगाना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि ऑक्सीमीटर लगाने के दौरान आपके हाथ में तेल, नेलपॉलिश या कोई दूसरी चीज न लगी हो। साथ ही, हाथ सूखा होना चाहिए। हाथ और उंगलियों को सीधे रखें नहीं तो रीडिंग प्रभावित हो सकती है।

कैसे बढ़ाएं ऑक्सीजन का स्तर:

पेट के बल लेटकर लंबी सांस लेने से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, इसे प्रोन पोजिशन कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसे करने से अपने आप ऑक्सीजन बढ़ता है। इसे करने के दौरान मरीजों को गर्दन के नीचे एक तकिया, दो तकियों को पेट और घुटनों के नीचे और एक को पंजों के नीचे रखना चाहिए। प्रत्येक 6 से 8 घंटों में करीब 40 मिनट तक इस अभ्यास को करना प्रभावी साबित हो सकता है।

* लक्षण के अनुसार अगर आपका बुखार, खांसी, तीन दिनों से ज्यादा है तो अपना कोविड टेस्ट अवश्य कराएं। experts के अनुसार कुछ कोविड टेस्ट के बारे में विस्तृत जानकारी इस प्रकार है- 

Rapid Antigen TEST-

Rapid Antigen TEST लैबोरेट्री के बाहर किया जाने वाला टेस्ट है. इसका इस्तेमाल टेस्ट के नतीजे को तुरंत जानने के लिए किया जाता है. कोविड-19 SARS-CoV-2 वायरस से होता है. इस टेस्ट में नाक से स्वाब लिया जाता है. इस टेस्ट में SARS-CoV-2 वायरस में पाए जाने वाले एंटीजन का पता चलता है. टेस्ट के नतीजे में एंटीजन की मौजूदगी कोरोना के संभावित संक्रमण का लक्षण है.

एंटीजन वो बाहरी पदार्थ है जो कि हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को एंटीबॉडी पैदा करने के लिए एक्टिवेट करता है. एंटीबॉडी बीमारियों से लड़ने में कारगर साबित होता है. एंटीजन वातावरण में मौजूद कोई भी तत्व हो सकता है, जैसे कि कैमिकल, बैक्टीरिया या फिर वायरस. एंटीजन नुकसानदेह है, शरीर में इसका पाया जाना ही इस बात का संकेत है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को एक बाहरी हमले से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने पर मजबूर होना पड़ा है.

एंटी बॉडी टेस्ट-

कोरोना की जांच के लिए एक और टेस्ट एंटीबॉडी टेस्ट है. एंटी बॉडी टेस्ट खून का सैंपल लेकर किया जाता है. इसलिए इसे सीरोलॉजिकल टेस्ट भी कहते हैं. इसके नतीजे जल्द आते हैं और ये RT-PCR के मुकाबले कम खर्चीला है. ये टेस्ट ऑन लोकेशन पर किया जा सकता है.

हालांकि एंटीबॉडी टेस्ट की कुछ सीमाएं हैं. इसलिए इसे अंतिम नहीं माना जाता है. इस टेस्ट में संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बनने का लक्षण पता चलता है. एंटीबॉडी शरीर का वो तत्व है, जिसका निर्माण हमारा इम्यून सिस्टम शरीर में वायरस को बेअसर करने के लिए पैदा करता है. संक्रमण के बाद एंटीबॉडीज बनने में कई बार एक हफ्ते तक का वक्त लग सकता है, इसलिए अगर इससे पहले एंटीबॉडी टेस्ट किए जाएं तो सही जानकारी नहीं मिल पाती है. इसके अलावा इस टेस्ट से कोरोना वायरस की मौजूदगी की सीधी जानकारी भी नहीं मिल पाती है. इसलिए अगर मरीज का एंटी बॉडी टेस्ट निगेटिव आता है तो भी मरीज का RT-PCR टेस्ट करवाया जाता है.

RT-PCR TEST –

इस टेस्ट को कोरोना की पहचान के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने गोल्ड स्टैंडर्ड फ्रंटलाइन टेस्ट कहा है. RT-PCR TEST में संभावित मरीज के नाक के छेद या गले से स्वाब लिया जाता है. ये टेस्ट लैब में ही किया जाता है. इस टेस्ट में Ribonucleic acid यानी कि RNA की जांच की जाती है. RNA वायरस का जेनेटिक मटीरियल है.

अगर मरीज से लिए गए सैंपल का जेनेटिक सीक्वेंस SARS-CoV-2 वायरस के जेनेटिक सीक्वेंस से मेल खाता है तो मरीज को कोरोना पॉजिटिव माना जाता है. इस टेस्ट में निगेटिव रिजल्ट तभी आता है जबकि मरीज के शरीर में वायरस मौजूद नहीं रहते हैं.

बता दें कि RT-PCR कोरोना टेस्टिंग की महंगी प्रणाली है. इसमें सैंपल से RNA निकालने वाली मशीन की जरूरत पड़ती है. इसके लिए एक प्रयोगशाला और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भी जरूरत पड़ती है. इस टेस्ट को करने में लैब में ही 4 से 5 घंटे का समय लगता है. इसकी लागत भारत में 4500 रुपये के करीब आती है. हालांकि कोरोना टेस्टिंग की ये सबसे विश्वसनीय पद्धति है।

प्रोनिंग क्या है? इससे कोरोना के मरीजों को क्या लाभ है?

दरअसल, यह एक बेहद पुरानी तकनीक है जिसे प्रोनिंग कहते हैं, इससे सांस लेने में समस्या होने वाले मरीजों को फायदा होते हुए देखा गया है.

इसमें सीने के नीचे तकिया रखकर पेट के बल लेटने से फेफेड़ों तक ज़्यादा ऑक्सिजन पहुंचती है. लेकिन इस तकनीक के अपने ख़तरे भी हैं.

ज्यादा ऑक्सीजन का मिलना-

मरीज़ों को प्रोन पोजीशन में कई घंटों तक लिटाया जाता है ताकि उनके फेफड़ों में जमा तरल पदार्थ मूव कर सके. इससे मरीजों को सांस लेने में आसानी होती है.

इंटेंसिव केयर यूनिट में कोविड-19 के मरीज़ों के साथ इस तकनीक का इस्तेमाल काफ़ी बढ़ा है.

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और फेफड़ों और क्रिटिकल केयर के मेडिसिन एक्सपर्ट पानागिस गालियातस्तोस ने कहा, “अधिकांश कोविड-19 मरीज़ के फेफड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती हैं और इससे ख़तरा पैदा होता है.”

डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, “जब ऐसे मरीज़ों को ऑक्सीजन दी जाती है तो वह भी कई बार पर्याप्त नहीं होती है. ऐसी स्थिति में हम उनको पेट के बल लिटाते हैं, चेहरा नीचे रहता है, इससे उनका फेफड़ा बढ़ता है.”

गालियातस्तोस के मुताबिक़ इंसानी फेफड़े का भारी हिस्सा पीठ की ओर होता है इसलिए जब कोई पीठ के बल लेटकर सामने देखता है तो फेफड़ों में ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचने की संभावना कम होती है.

इसकी जगह अगर कोई प्रोन पॉजिशन में लेटे तो फेफड़ों में ज़्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है और फेफड़े के अलग-अलग हिस्से काम करने की स्थिति में होते हैं.

डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, “इससे बदलाव दिखता है. हमने इस तकनीक से कई मरीज़ों को फ़ायदा मिलते देखा है.”

एक्यूट रिसेपरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) वाले कोविड-19 मरीज़ों के लिए मार्च महीने में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने 12 से 16 घंटे तक प्रोनिंग की अनुशंसा की थी.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक़ यह तकनीक बच्चों के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है लेकिन इसे सुरक्षित करने के लिए लिए प्रशिक्षित लोग और अतिरिक्त विशेषज्ञता चाहिए.

अमरीकी थोरासिस सोसायटी ने चीन के वुहान स्थित जियानतान हॉस्पिटल में फ़रवरी महीने में एआरडीएस वाले 12 कोविड मरीज़ों पर अध्ययन किया. इस अध्ययन के मुताबिक़ जो लोग प्रोन पॉजिशन लेट रहे थे उनके फेफड़ों की क्षमता ज़्यादा थी.

तकनीक के ख़तरे-

हालांकि यह तकनीक बहुत आसान लग रही है लेकिन इसके अपने ख़तरे भी हैं. मरीज़ों को उनके पेट पर लिटाने में वक़्त लगता है. इसमें अनुभवी पेशेवरों की ज़रूरत भी होती है.

डॉ. गालियातस्तोस ने बताया, “यह आसान नहीं है. इसे प्रभावी ढंग से करने के लिए चार या पांच पेशेवरों की ज़रूरत होती है.”

अस्पतालों में यह काफ़ी मुश्किल होता है क्योंकि वहां पहले से ही स्टाफ़ की कमी होती है और कोविड-19 मरीज़ों की बढ़ती संख्या ने उनकी मुश्किलों को बढ़ा दिया है.

डॉ. गालियातस्तोस के मुताबिक़ जोंस होपकिंस हॉस्पिटल में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रोनिंग के लिए एक अलग टीम तैयार की गई है.

गालियातस्तोस ने बताया, “अगर कोविड-19 मरीज़ वैसे इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती हों जहां इस तकनीक में सक्षम स्टाफ नहीं हों तो वहां के स्टाफ विशेष टीम से स्टाफ को बुला सकते हैं.”

लेकिन मरीज़ों की पोजिशन बदलने में दूसरी अन्य मुश्किलें भी शुरू हो सकती हैं.

डॉ. गालियातस्तोस ने बताया, “हमारी बड़ी चिंताओं में मोटापा एक है. हमें छाती में इंजरी वाले मरीज़ों के साथ भी सावधान होना होता है. इसके अलावा वेंटिलेशन औरर कैथेटर ट्यूब वाले मरीजों में सावधानी बरतनी होती है.”

हालांकि इस तकनीक से हार्ट अटैक का ख़तरा भी बढ़ जाता है और कई बार सांस में अवरोध भी पैदा हो सकता है.

तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल

1970 के दशक के मध्य में प्रोनिंग के फ़ायदे को पहली बार देखा गया था. विशेषज्ञों के मुताबिक 1986 के बाद दुनिया भर के अस्पतालों में इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू हुआ.

लुसियानो गातिनोनी इस तकनीक पर शुरुआती अध्ययन और अपने मरीज़ों पर सफलातपूर्वक इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों में एक रहे हैं.

लुसियानो इन दिनों एनिस्थिसियोलॉजी (निश्चेत करने वाले विज्ञान) एवं पुनर्जीवन से जुड़े विज्ञान के एक्सपर्ट हैं. इसके अलावा वे मिलान स्टेट यूनिवर्सिटी में एमिरेट्स प्रोफ़ेसर हैं.

प्रोफ़ेसर लुसियानो ने बीबीसी को बताया कि शुरुआती दिनों में प्रोनिंग को मेडिकल समुदाय के रूढ़िवादी होने के चलते काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा.

प्रोफ़ेसर लुसियानो ने कहा, “लेकिन अब इस तकनीक का काफ़ी इस्तेमाल होता है.” उनके मुताबिक़ प्रोनिंग से फेफड़ों में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ने के अलावा दूसरे फ़ायदे भी हैं.

उन्होंने बताया, “जब मरीज़ चेहरा नीचे करके लेटता है तो उसके फेफड़ों के अलग-अलग हिस्सों एक समान दबाव वितरित होता है.”

प्रोफेसर लुसियानो ने बताया, “फेफड़े को आप वेंटिलेटर की यांत्रिक ऊर्जा की तरह देखिए, तो इसके लगातार काम करना होता है. अगर फेफड़े के अलग-अलग हिस्सों पर एक समान दबाव लगेगा तो इसका नुकसान कम होगा.”

इस शताब्दी की शुरुआत में हुए दूसरे अध्ययनों में भी इस तकनीक के फायदे बताए गए हैं.

फ्रांस में 2000 में हुए एक अध्ययन के नतीजे भी बताते हैं कि प्रोनिंग से मरीजों के फेफड़ों में ज्यादा ऑक्सीजन तो पहुंची ही साथ में उनके बचने की संभावना भी बढ़ गई.

ऐसे में प्रोनिंग के तकनीक के तौर उस महामारी में अपनाया जा सकता है जिसके चलते दुनिया भर में हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है और जिसका फ़िलहाल कोई इलाज भी नहीं है.

प्रोफ़ेसर गालियातस्तोस ने बताया, “जब तक इलाज नहीं मिलता, तब तक हम ऐसी थेरेपी का इस्तेमाल कर सकते हैं.”

मुझे उम्मीद है कि यह आर्टिकल आपको जरूर पसंद आया होगा। कृपया हो सके तो इसे शेयर अवश्य करें।

मनीष यादव

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