आयुर्वेद के अनुसार दही और मट्ठा के फायदे | Benefits of Yogurt and Whey (Buttermilk) according to Ayurveda

नमस्कार ! मित्रों, कैसे हैं आप सभी? आज मैं आपके लिए एक बहुत ही रोचक जानकारी लेकर आया हूँ। वैसे तोआयुर्वेद के अनुसार दही और मट्ठा के फायदे अनगिनत हैं। फिर भी आपको आज मैं दही और मट्ठा से सम्बंधित कुछ नयी जानकारियों से अवगत कराने जा रहा हूँ। आपको अच्छा लगेगा। जिन लोगों को दूध प्रकृतिवश माफिक न आता हो अथवा कोई ऐसा रोग हो जिसमें दूध से खराबी पैदा होने का डर हो तो उस दशा में दूध को दही या मट्ठा के रूप में परिवर्तित करके काम में लाया जाना उचित है। दही पचने में दूध की अपेक्षा हलका होता है और उसमें शरीर के भीतर के हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करने का गुण भी अधिक होता है। आयुर्वेद के ग्रंथों के लेखानुसार, “दही अतिसार, अरुचि और दुबलेपन को नाश करने वाला तथा बल-वीर्य वर्धक है।

Benefits of Yogurt and Whey (Buttermilk)

”स्वास्थ्य की दृष्टि से बाजार के दही की अपेक्षा घर का विशेष रूप से जमाया दही अधिक गुणकारी सिद्ध होता है। बाजार में अधिक ठोस दिखाई पड़ने के लिए उसे 10-12 घंटे तक रखकर काम में लाया जाता है। पर स्वास्थ्य-वृद्धि की दृष्टि से गर्मी में 3-4 घंटे तक जमाया हुआ और जाड़े में 6-8 घंटे तक रखा हुआ दही अधिक उपयोगी होता है। ऐसे दही में जामन आदि ऐसे ढंग से डालना चाहिए जिससे वह खट्टा न होने पावे। रोगनिवारण के लिए सदैव मीठा दही ही काम में लाया जाता है। उपयोग में लाने से पहले उसे मथानी से थोड़ा-बहुत बिलो लेना चाहिए, जिससे उसके कण टूटकर वह एक रूप हो जाए। ऐसे दही और मट्ठा के फायदे ज्यादा होते हैं. और ये शीघ्र पचने वाला होता है। 

जिन लोगों को कमजोरी अधिक बढ़ गई हो अथवा पाचन शक्ति बहुत क्षीण हो गई हो; उनको दही के बजाय बिलोकर उसका मक्खन निकाल लेना चाहिए। इससे वह संग्रहणी, पेचिश आदि में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। 

इस विषय में स्वास्थ्य प्रेमी व्यक्तियों ने अनुभव और परीक्षण करके जिन बातों का पता लगाया है कि वे मानव शरीर को निरोग तथा कार्यक्षम बनाए रखने की दृष्टि से बड़ी उपयोगी हैं। जैसा हम आरंभ में लिख चुके हैं, मट्ठा या तक्र अनेक शारीरिक रोगों को मिटाने वाला और दीर्घायु देने वाला होता है। आयुर्वेद में तो तक्र को अमृत के समान लाभदायक बताया है और भोजन के पश्चात उसे थोड़ी मात्रा में पीना अति आवश्यक और उपयोगी कहा है। 

मट्ठा के संबंध में भ्रम 

हमारे देश के अनेक लोगों में मट्ठा के संबंध में बड़ा भ्रम पाया जाता है। कुछ लोग उसे सर्द मानते हैं और उससे खांसी जुकाम आदि उत्पन्न होने का भय बतलाते हैं। ज्वर आदि की दशा में तो इसका प्रयोग बड़ा भयंकर समझा जाता है। परंतु इसका कारण उनका अज्ञान और मट्ठा के व्यवहार की ठीक विधि का न जानना ही है। यों तो बिना विधि के व्यवहार किया हुआ अमृत भी विष का ‘काम करता है, फिर जो लोग दूध, दही या मट्ठा को मनमाने ढंग से या केवल स्वाद के लिए काम में लाएं, उन्हें हानि उठानी पड़े तो इसमें आश्चर्य क्या! अन्यथा मट्ठा पचने में हल्का, कीटाणुनाशक, अग्नि को तीव्र करने वाला होता है, इसलिए स्वास्थ्य की सामान्य दशा में और अधिकांश रोगों में भी बहुत लाभदायक सिद्ध होता है। उससे रक्त के दूषित कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और शरीर के भीतरी भाग की बहुत कुछ सफाई हो जाती है। वैद्यक शास्त्र में मट्ठा के गुणों का वर्णन करते हुए लिखा है-

क्षुद्रर्धन॑ नेत्ररूजापहञ्च प्राणपद शोणित मासद॑ च। 

आमाभिघाते कफ वात हन्तृत्वष्टौ गुणा वै कथिता हि तक्रे॥ 

तक्र के व्यवहार से आठ लाभ होते हैं–यह भूख को बढ़ाता है, नेत्र रोगों को दूर करता है, प्राणों की वृद्धि करता है, रक्त और मांस को बढ़ाता है, आम को नष्ट करता है, दूषित कफ और वात को ठीक करता है।

मट्ठा का उपयोग पेट के रोगों के लिए बड़ा उपकारी माना गया है। चिकित्सा की दृष्टि से संग्रहणी एक बहुत दुस्साध्य रोग माना गया है। इसमें आँतों का आकार बढ़कर उनमें ऐसा विकार आ जाता है कि अपच भोजन ही छोटी आँतों में पहुँच जाता है और समस्त पाचन तथा मल-विसर्जन क्रिया को दूषित करके तरह तरह के अन्य रोगों को उत्पन्न करने लगता है।

इसका कारण यह बतलाया गया है कि “ग्रहणी’ नामक कपाट या परदा अमाशय से छोटी आँतों में अपच चीजों को जाने से रोकता है, उसमें कड़ापन आकर उसका लोच कम पड़ जाता है। इसलिए वह अपना काम ठीक नहीं कर पाता है और अधपचा या अपच भोजन ही आँतों में बहकर चला जाता है। मठा की खटास में यह खास गुण है कि वह आँतों और ग्रहणी की लोच को फिर से पैदा कर देता है, जिससे अधपचा भोजन आमाशय में ही रुका रहता है। इस गुण के कारण वैद्य, डॉक्टर, हकीम सभी संग्रहणी रोग में मठे के प्रयोग की सलाह देते हैं।

मट्ठा से कब्ज का इलाज

यह भी जानते हैं कि हमारे अधिकांश रोगों का कारण कब्ज होता है। जब आलस्य या किसी प्रकार की अन्य बाधा के कारण मनुष्य समय पर शौच को नहीं जाते या ऐसा आहार करते हैं जिसका परिपाक भली प्रकार नहीं हो पाता, तो उसका पूर्ण रूप से मल रूप में बाहर निकालना कठिन हो जाता है और उसका कुछ अंश मलाधार में ही जमा होकर सड़ने लगता है। यह दूषित अंश दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है और उससे कितने ही प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं, जो थोड़े समय के पश्चात तरह-तरह के णेगों के रूप में प्रकट होते हैं। जब कब्ज का कष्ट प्रतीत होता है वो अधिकांश लोग कोई दस्तावर चूर्ण या जुलाब का सेवन करने की सलाह देते हैं, इसमें दो-एक दिन तो कुछ दस्त होकर आराम मालूम पड़ने लगता है, पर फिर वही हालत हो जाती है। अगर मनुष्य अपना खान-पान ठीक न करे और आँतों की दशा को न सुधारे, तो चूरन और जुलाब लाभ के बजाय शर्तिया हानि पहुँचाने वाले ही सिद्ध होते हैं। एक तरह वह स्वाभाविक पाचन क्रिया को खराब करते हैं और दूसरी तरफ आँतों की मल फेंकने की शक्ति को कम करते हैं। इस अवस्था में मठा प्रयोग सर्वोत्तम प्रभाव _ दिखलाता है। यह पाचनशक्ति को ठीक करता है, मंदाग्नि को दूर करता है और आँतों की संकोचशीलता (इलास्टीसिटी) को फिर से उत्पन्न करके मल को बाहर निकालता है। इस प्रकार से मठा के प्रयोग से पाचनयंत्र तथा मल-निष्कासन यंत्र के विकार दूर होकर उनकी स्वाभाविक शक्ति बढ़ती है और ये बिना दवा के स्वयं ही अपना पूरा काम अंजाम देने लगते हैं। 

मट्ठा और वृद्धावस्था 

आधुनिक समय के शरीर विज्ञान ज्ञाताओं ने वृद्धावस्था और उसके कारणों पर खोज करते हुए यह सिद्ध किया है कि मानव स्वास्थ्य के निर्बल पड़ने और वृद्धावस्था के आगमन का एक प्रधान कारण शरीर के भीतर ‘यूरिक एसिड” नामक तत्त्व का जमा हो जाना है। भोजन में अन्न, दाल, मांस आदि पदार्थ अधिक खाने से एक प्रकार का अम्ल (खटास) पैदा होता है, जो बहुत-सी बीमारियों का सूत्रपात करता है, इसी को “यूरिक एसिड कहते हैं। जब रक्त-मांस में इसका परिमाण बढ़ जाता है तो यह धीरे-धीरे रक्तवाहिनी नाड़ियों में जमने लगता है और जैसे सफाई न होने से दाँतों, घरों के फर्श या बरतनों पर एक मैल की पपड़ी-सी जमने लगती है, जो धीरे-धीरे कड़ी पड़ जाती है और फिर बहुत कठिनाई से छूटती है। उसी प्रकार यह यूरिक एसिड भी नसों के भीतर पपड़ी की तरह जम जाता है और उनकी संकोचशीलता, लोच को कम कर देता है। इसका कुप्रभाव रक्ताभिसरण पर पड़ता है और जब शुद्ध खून काफी तादाद में शरीर को मिलने नहीं लगता तो उसकी शक्ति और विशुद्धता में अंतर पड़ने लगता है। 

यह खराबी शरीर के भीतर तरह-तरह की रोग जैसी अवस्थाएँ पैदा करने लगती है और कम आयु में ही मनुष्य को बूढ़ा बना देती है। ऐसे व्यक्ति के बाल असमय में ही सफेद हो जाते हैं, शरीर में झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं, शरीर का रंग खराब होकर बदरंग हो जाता है, जब यह यूरिक एसिड संधि-स्थानों (जोड़ों) में इकट्ठा हो जाता है, तब उनमें हिलाने-डुलाने से दर्द मालूम पड़ने लगता है। इसी को संधिवात, गठिया आदि के नाम से पुकारा जाता है। 

मट्ठा का प्रयोग करने से उसका प्रभाव गुर्दे पर पड़ता है और मूत्र में होकर यह दूषित तत्व बहुत कुछ निकल जाता है। जब रक्त शुद्ध हो जाता है तो तमाम रोग भी अपने आप शमन हो जाते हैं ।शरीर पर जो वृद्धावस्था के चिन्ह प्रकट हो रहे थे, वे स्वयमेव मिट जाते हैं और नई कांति जान पड़ती है। मठा में पाए जाने वाले लैक्टिक एसिड के द्वारा जब यूरिक एसिड घुलकर शरीर से बहिर्गत कर दिया जाता है, तो रोगी को एक प्रकार का नवजीवन प्राप्त हो जाता है क्योंकि रोगों का मूल कारण तो शरीर के भीतर इस विजातीय तत्त्व का जमा हो जाना ही होता है । इस तथ्य को भारतीय आयुर्वेद में भी स्वीकार किया गया है और कहा है-

स्रोत: सुतक्र शुद्धे सुरस: सम्यमुपैति यः। 

तेन पुष्टिबलं वर्ण प्रहर्षश्चापजायते॥ 

तक्र का ठीक ढंग से सेवन करने से शरीरस्थ स्रोत (नाड़ियाँ) शुद्ध हो जाते हैं। इससे शरीर पुष्ट होता है, बल की वृद्धि होती है, रंगत साफ होती है और मन में हर्ष का भाव उत्पन्न होने लगता है। 

मट्ठा की रोग निवारक शक्ति 

इसी प्रसंग में आगे चलकर यह भी बतलाया गया है कि मट्ठा या तक्र किन-किन रोगों में विशेष लाभदायक सिद्ध होता है। एक प्रामाणिक वैद्यक ग्रंथ में कहा है-

शीतकालेsग्निमान्द्य च तथा वातामयेशु च। 

अरुचौ सत्रोतसां रोधे तक्र स्थात्‌ अमृतोपमम्‌।।

तन्तुहन्ति गरशछर्दि प्रसेक विषम ज्वरान्‌। 

पाण्ड्डर्मदो ग्रहण्यशञो मूत्रग्रह भगन्दरान्‌॥ 

मेहं गुल्फमतीसारं शूल प्लीहोदरारुचि: ।। 

श्वित्र कोष्ठगतव्याधीनकुष्ठ शोध तृषाकृमीन्‌।

सर्दी, अग्निमांद्य, वात संबंधी रोग, अरुचि, रक्तवाहिनी नाड़ियों के अवरोध में तक्र (मट्ठा) अमृत के समान गुणकारी है। विषयुक्त पदार्थ, उल्टी, जी मिचलाना, विषम ज्वर, पीलिया रोग, मेद रोग (मोटापा), संग्रहणी, बवासीर, मूत्र का रुक जाना या कष्ट होना, भगंदर, प्रमेह, गुल्म (वायु गोला), अतिसार (दस्त), शूल (पेट का दर्द), तिल्ली का बढ़.जाना, भोजन की इच्छा न होना, श्वेत कुष्ठ, तृषा रोग, कृमि रोग–इन सब में मट्ठा का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होता है। 

रोग की अवस्था में मट्ठा और दूध का प्रयोग चिकित्साशास्त्र के मतानुसार विशेष विधियों से करना चाहिए, पर साधारण अवस्था में इसको भोजन के एक अंग के रूप में ग्रहण करना चाहिए। जैसे अनेक लोग रात को सोने से कुछ पहले नियमित रूप से दूध पीते हैं, इससे उनका पेट साफ रहता है और शीघ्र किसी रोग का आक्रमण नहीं हो पाता। 

कुछ वर्ष पूर्व होशंगाबाद (म० प्र०) के एक ग्राम के निवासी सौ वर्ष की आयु भोगकर स्वस्थ अवस्था में मरे थे। जब उनसे उनके नीरोग जीवन का रहस्य पूछा गया तब उन्होंने बताया था–‘मैं सदैव सोने से पूर्व एक सेर दूध पिया करता हूँ और इसके लिए स्वयं ही गाय भी पालता हूँ।” इसी प्रकार महाराष्ट्र के शतवर्षीय व्यक्ति भोजन के अंत में एक कटोरी मट्ठा अवश्य पीते हैं और उससे उनके स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इस नियम को वैद्यक-शास्त्र में भी स्वास्थ्य प्रदायक बतलाया गया है-

भोजनान्ते पिवेत्तक्रं निशान्ते च पिवेज्ज्लम्‌। 

निशामध्ये पिवेददुग्धं कि वैद्यस्यथ प्रयोजनम्‌॥ 

भोजन के अंत में तक्र (मट्ठा) पिए, प्रातःकाल उठकर जल पिये और रात के समय दूध पीये तो फिर वैद्य की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । अर्थात ये तीनों नियम नीरोगता की वृद्धि और स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले हैं। जो सोच-समझकर ठीक नियम से इनका पालन करेगा, उसके रोगी होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। 

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